सिद्ध साहित्य की विशेषताएं।


सिद्ध साहित्य की विशेषताए।
सिद्धि साहित्य अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण हिंदी साहित्य में विशेष महत्व रखता है। इन्होंने अपने संप्रदाय के सिद्धांतो का दीगदर्शन करनेवाली साधनापरक साहित्य का निर्माण किया। सिद्ध-साहित्य की विशेषताएं इस प्रकार हैं।

१) गुरु महिमा का महत्व:-
सिद्धो ने गुरु महिमा का वर्णन किया है। सिद्धो के अनुसार गुरु का स्थान  वेद और शास्त्रों से भी ऊंचा है । सरहप्पा कहते है कि गुरु की कृपा से ही सहजानंद
की प्राप्ति होती है। गुरु के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जिसने गुरुप्रदेश का अमृतापान नहीं किया व, शास्त्रों की मरूभूमि से प्यास से व्याकुल होकर मग जाएगा।


२)  बाह्माडम्बरों , पाखंण्डो की कटु आलोचना:-
 सिद्धो ने पुरानी रूढ़ियों, परंपराओं और  बाह्माडम्बरों का जमकर विरोध किया है । इसलिए उन्होंने वेदों ,पुराणों और शास्त्रों की खुलकर निंदा की है।वर्ण व्यवस्था ऊंच-नीच और ब्राह्मण धर्मों के कर्मकांड ऊपर जमकर  प्रहार किया है।

३) जन भाषा का प्रयोग:-
सिद्धों  की रचनाओं में संस्कृत तथा विदेशी भाषा का प्रयोग मिलता है। डॉ रामकुमार वर्मा इनकी भाषा को जन समुदाय की भाषा मानते हैं ।जन भाषा को अपनाने के बावजूद जहां वे अपनी सहज साधना की व्याख्या करते हैं वहां उनकी भाषा क्लिष्ट (Clean) बन जाती है।
सिद्धों  की भाषा को हरी प्रसाद शास्त्री ने संधा -भाषा कहां है।



४) जीवन की सहजता में विश्वास:-
सिद्ध कवियों ने जीवन की सहायता और स्वाभाविकता  में दृढ़ विश्वास व्यक्त किया है । अन्य धर्म के अनुयायियों ने जीवन पर कई प्रतिबंध लगाकर जीवन को कृत्रिम बनाया था। विशेषकर कनक कामिनी को साधना मार्ग की बाधाएं मानी  थी। विभिन्न विभिन्न कर्मकांड से साधना मार्ग को भी कृतिम बनाया था।  सिद्धों नें इन सभी कृतिमो का  विरोध कर जीवन की सहजता और स्वाभाविकता  पर बल दिया उनके अनुसार यह सुख से ही महासुख की प्राप्ति होती है।।

५) श्रृंगार और शांत रस:-
सिद्ध कवियों की रचना में श्रृंगार और शांत रस का सुंदर प्रयोग हुआ है।
कहीं-कहीं पर उत्थान श्रृंगार चित्रण मिलता है। अलौकिक आनंद की प्रति का वर्णन करते समय ऐसा हुआ है।

६) छंद का प्रयोग:-
सिद्धों ज्यादातर रचनाएं चर्या  गीतों में हुए हैं।
तथापि इसमें दोहा ,चौपाई जैसे लोकप्रिय छंद भी प्रयुक्त हुए हैं ।सिद्धों के लिए दोहा बहुत ही  प्रिया छंद है। उनकी रचना में कहीं-कहीं सोरठा और छप्पय का भी प्रयोग पाया मिलता है।


७) साहित्य के आदि की प्रामाणिक सामग्री:-
सिद्ध साहित्य का महत्व इस बात में बहुत अधिक है कि उससे हमारे साहित्य के आदि रूप  की सामग्री प्रामाणिक ढंग से प्राप्त होती है। चारणकालीन साहित्य तो केवल तत्कालीन राजनीतिक जीवन की प्रतिछाया है। लेकिन सिर्फ सिद्ध साहित्य शताब्दियों से आने वाली धार्मिक और सांस्कृतिक विचारधाराओं का एक सही दस्तावेज है



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