रासो काव्य परंपरा।

रासो काव्य परंपरा : 




हिंदी साहित्य के आरंभिक काल में प्राप्त ग्रंथों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस काल के अधिकांश शब्द नाम के अंत में ' रास'  जुड़ा हुआ है।  जो काव्य शब्द का पर्यायवाची है। रासो शब्द की उत्पत्ति के संबंध में कई विद्वानों में मतभेद है।

*)प्रथम फ्रेंच  इतिहासकार "गार्सा द तासी" ने इस शब्द की उत्पत्ति राज्यसूय यज्ञ से मानी है।

*)आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस शब्द की उत्पत्ति रसायन से जोड़ते हैं ।

*)डॉ.मोतीलाल  मेनरिया ने इस शब्द का संबंध रहस्य से माना है।

*) श्री नरोत्तम स्वामी इस शब्द की उत्पत्ति रसिक से मानते हैं। प्राचीन राजस्थानी में रास का अर्थ  काव्य माना जाता है ।

कुछ विद्वान इस शब्द का संबंध राशि या रासक से जोड़ते हुए इसका अर्थ ध्वनि क्रीडा विलास गर्जन और श्रृंखला आदि देते हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रसाद को एक शब्द भी मानते हैं। और काव्य वेद भी उनके अनुसार जो काव्य राशन छंद में लिखे जाते थे वहीं हिंदी में रासो कहलाने लगे।


ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल की कविता के संबंध में अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ एक काव्य चरित्र प्रधान है। इन चरित्रों को काम में बांधने के लिए ही इस छंद का प्रयोग होता रहा है। वस्तुत: रासो काव्य मुलत: रासक छंद का समूचय है। अपभ्रंश में 29 मात्रा का एक रासा यारा छंद प्रचलित था। ऐसी अनेक शब्दों के गांव की परंपरा कदाचित लोकगीतों में रही होगी। एकरसता न रहे इसलिए बीच-बीच में दूसरे छंद जोड़ने और गाने की प्रथा भी उस समय से चली होगी संदेश रासक इसका सुंदर नमूना है। पहले रासो काव्य छंद में लिखे गए कालांतर में इनमें बदलाव आया होगा जिनके फलस्वरूप गेय मुक्तक छंदों का उपयोग किया जाने लगा।बीसलदेव रासो का एक ऐसा ही प्रेम प्रधान काव्य है । जिसमें रासकेतर छंद का प्रयोग हुआ है। आगे चलकर काव्य का रूप कोमल भावनाओं के अतिरिक्त अन्य भावों की अभिव्यक्ति का वाहक बना प्रेम भाव के साथ इनमें वीरों की गाथात्मक चेतना ओं को स्थान मिला इस तरह इस काल के रासो काव्य में एक साथ विरचित और श्रृंगार उचित भावनाओं के वर्णन  सुलभता पूर्वक मिल जाते हैं।


  
रासो साहित्य मुलत: सामंती व्यवस्था प्रकृति और संस्कार से उपजा हुआ साहित्य है जिसे देशी भाषा काव्य के नाम से भी जाना जाता है इस साहित्य के रचनाकार हिंदू राजपूत राजाश्रय मैं रहने वाले चारण या भाट थे।

समाज में उनका स्थान बहुत अच्छा और उनका बहुत सम्मान था। क्योंकि उनका संबंध सीधे राजा से होता था यह चारण या भाट कला पारखी और कला रचना में निपुण होते थे।

 यह कुशलता से युद्ध करना भी जानते थे और युद्ध शुरू होने पर अपनी सेना की अगुवाई विरुदावली गा गा कर किया करते थे। यह राजाओं आश्रदाताओं और वीर पुरुषों तथा सैनिकों के विरोधी युद्ध घटनाओं को केवल बढ़ा चढ़ाकर कि नहीं उसकी यथार्थ परक अतिथियों एवं संदर्भों को भी बारीकी के साथ चित्रित करते थे। विरो चित भावनाओं के वर्णन के लिए इन्होंने  रासो छंद का प्रयोग किया था।
 क्योंकि यह छंद इस भावना को संप्रेषित करने के लिए अनुकूल था।

 इसीलिए इनके द्वारा रचित काव्य को रासो काव्य कहा गया ।



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