रासो काव्य के नाम।

रासो काव्य के नाम


खुमाण रासो
रासो काव्य परंपरा की प्रारंभिक रचनाओं में खुमाण रासो का स्थान सर्वप्रथम है। इसका स्वर प्रथम उल्लेख शिव सिंह सेंगर की कृति शिव शिव सरोज में मिलता है। इसके रचीयता दलपति विजय है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल स्कोर नवी शताब्दी सन ८१२ इसवी की रचना मानते हैं। इसमें राजस्थान के चित्तौड़ नरेश खुमन ने ,
द्वितीय के युद्धों का सजीव वर्णन किया गया है।

 इस ग्रंथ की प्रामाणिक हस्तलिखित प्रति पुना संग्रहालय में सुरक्षित है ।खुमान रासो 5000 छंदों का एक विशाल ग्रंथ है। इसमें समकालीन राजाओं के आपसी विवादों के बाद हुए एकता के साथ अब्बासिया वंश आलमांमू खलीफा और खुमाण के साथ हुए युद्ध का चित्रण मिलता है। इस कृति का प्रमुख प्रतिपाध राजा खुमाण का चरित्रांकन करना है। उनके चरित्र के दो प्रस्थान बिंदु है। एक युद्ध और दूसरा प्रेम कुमार के प्रेम को दर्शाने के लिए ही कृतिका ने विवाह नायिका भेद का वर्णन किया है। जो रमणिया है ।अन्य रासो ग्रंथों के समान इसमें भी श्रृंगार और वीर दोनों रस प्रधान रहे हैं ।

इसमें दोहा सवैया कवित्त आदि विविध छंदों का सूचाख प्रयोग हुआ है।
इसकी भाषा राजस्थानी हिंदी रही है काव्य सौंदर्य भाषा शैली की दृष्टि से यह एक सरल और सफलता भी माना जाता है।


*)परमाल रासो

रासो काव्य परंपरा की प्रमुख कृति के रूप में परमाल रासो का नाम भी लिया जाता है। इससे आल्हाखंड भी कहते हैं। अचार रामचंद्र शुक्ल ने इसे बैलेड तथा डॉ रामकुमार वर्मा ने इसे वीरगाथा का भी कहा है। कुछ विद्वान इसे विकासशील लोक महाकाव्य मानते हैं।

 इसकी जनता में अध्यात्मिक लोकप्रियता को देखते ग्रियर्सन ने इसे वर्तमान युग का सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य माना था। अभी तक इस की प्रमाणित प्रति उपलब्धि नहीं हुई है । इसके रचयिता जगनिक है जो महोबा के नरेश परमदि देव वे आश्रित थे रचनाकार ने इस काव्य में महोबा देश के 2 लोग प्रसिद्ध वीरो आल्हा और ऊदल कबीर चरित्र को यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया है। इनके द्वारा किए गए विभिन्न युद्धों का बड़ी उत्तेजित भाषा में वर्णन किस ग्रंथ की विशेषता है। इसमें आल्हा छंद ( वीर छंद) का प्रयोग हुआ है इसकी भाषा बैसवाडी है।

*)यह काव्य शिक्षित समाज की अपेक्षा और शिक्षित या अध्द शिक्षित समाज में ही अधिक लोकप्रिय रहा है यह सदैव गायों को की परंपरा द्वारा ही विकसित होता रहा है यह एक गेय - काव्य है इसकी मूल प्रेरणा वैयक्तिक वीर भावना स्वाभिमान दर्द और साहस पूर्ण भाव का वर्णन करने की रही है।


*) हम्मीर रासो

 हम्मीर रासो  अभी तक एक स्वतंत्र कृति के रूप में उपलब्ध नहीं हो सका है। अपभ्रंश के प्राकृतिक पैंगलम नामक एक संग्रह ग्रंथ में संग्रहित  
हम्मीर विषयक 8 छंदों को देख आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे एक स्वतंत्र ग्रंथ माना है।प्रचलित धारणा के अनुसार इस कृति के रचयिता शाडऺग:धर माने जाते हैं परंतु कुछ पदों में' जज्जल भणह वाक्यांश देख पंडित राहुल ने इसमें जज्जल नामक किसी कवि की रचना माना है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है की प्राकृतिक पैंगलम की टिका मैं भी इन्हें जज्जल की ही उकित माना गया है।

अतः इसके रचयिता शाडऺग:धर न होकर जज्जल है इस कवि में हमीर देव और अलाउद्दीन के युद्ध का वर्णन किया गया है इसका रचनाकाल तेरहवीं शती माना जाता है क्योंकि हमीर देव सन् १३०० इसवी में अलाउद्दीन की चढ़ाई में मारे गए थे इस कृति का उद्देश्य  हम्मीर की वीरता का वर्णन करना है।

*)विजयपाल रासो

मिश्र बंधुओं ने अपने ग्रंथ मिश्र बंधु विनोद में इस परंपरा की एक रचना विजयपाल रासो का उल्लेख किया है। इसके रचयिता नल्हसिंह भाट माने जाते हैं।
इसका रचनाकाल सन् १२९८ इसवी माना जाता है। डॉक्टर राज नाथ शर्मा के अनुसार इस कृति में विजय पाल सिंह और बंग राजा के युद्ध का वर्णन किया गया है। डॉ राजबली पाण्डेय क्या अनुसार इस रचना में रचनाकार में राजा विजयपाल सीना और भंग राजा के बीच हुए युद्ध को सजीव रूप में चरित्र किया है इस कृति में केवल   ४२ छंद ही उपलब्ध है।


*) बीसलदेव रासो

बीसलदेव रासो इस काव्य परंपरा की पांचवी कृति है।
इसके रचीयता नरपति नाल्ह  माने जाते हैं जो अजमेर चौहान राजा विशाल जी के समकालीन थे। इसमें अजमेर नरेश विग्रहराज अपना बिसलदेव और उनकी पत्नी राजा भोज की पुत्री राजमती के विवाह कला विरह और मिलन के मार्मिक चित्र अंकित किए गए हैं। इस ग्रंथ की सबसे निराली विशेषता यह है कि यह हिंदी के अन्य रासो ग्रंथों के समान वीरता का प्रशंसा गायन ना होकर कोमल प्रेम के मधुर मार्मिक और संवेदना से ग्रुप का अमर चित्र है।

विप्रलम्भ श्रृंगार इसका प्रधान वर्ण्य विषय है चार खंडों में विभाजित सवा सौ चंदू का यह छोटा सा काव्य पुराने संवेदना का रूप प्रस्तुत करता है।इसके प्रथम खंड में बीसलदेव और मालवा के भोज परमार की कन्या राजमती का विवाह वर्णन दूसरे खंड में बिसलदेव का रानी से रुढकर  उड़ीसा जाना तथा वहां 12 वर्ष तक रहना तीसरे खंड में राजमती का विरह वर्णन तथा बिसलदेव का उड़ीसा सेल घटना और चौथे खंड में रोज का अपनी पुत्री को अपने घर ले आना की कथा तथा बीसलदेव का उसे पुन: चित्तौड़ लौटा लाने का प्रसंग वर्णित है यह सारी कथा ललित मुक्तकों मैं कहीं गई है।

संदेश रासक की भाॅति बीसलदेव रासो भी मुख्यत: विरह काव्य है यह ग्रंथ विरह के स्वाभाविक चित्र संयोग और विप्रलम्भ श्रृंगार की सफल उद्भव ना और साथ ही प्रकृति के रूप चित्रों से परिपूर्ण है। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि विविध घटनाओं के वर्णो के होते हुए भी इस काव्य में इतिवृत्तात्मकता नहीं है नायिका राजमती का चरित्र बड़ा ही सजीव तथा विल्सन बंद पड़ा है। " मध्य युग के समूचे हिंदी साहित्य में जबान की इतनी तेज और मंकी इतनी खरी नायिका नहीं दिख पड़ती है।" राजा विष्णु ने 1 दिन राजकीय अभिमान की रौ  में कहा कि मेरे समान दूसरा भुपाल नहीं। रानी राजमती से यह मिथ्याभिमान नहीं सहा गया।

उसने कहा कि उड़ीसा का राजा तुमसे धनी है।जिस प्रकार तुम्हारे राज्य में नमक निकलता है उसी तरह उसके घर में हीरो की रवानों से हीरा निकलता है। राजा यह सब सो गए बहुत जल गया और रूठ गया तथा रानी के लाभ अनुनय विनय करने पर भी उड़ीसा निकल गया राजमती जमा की तेज है तो क्या हुआ आखिर है तो नारी ही विरह से उसका हरदे वीदीणऺ‌ हो जाता है उसे अपने स्त्री जीवन पर उसे रोना आता है।
12 वर्ष के पश्चात राजा के वापस लौटने पर रानी की कैंची जैसी जबान ने फिर एक बार वार कर दिया उसने राजा को ताना मारा कि दिया कि
 
 'स्वामी गी विणाजे 
यह नई जीतियड तेल '
अर्थात् हे स्वामी!'  

तुमने वाणिज्य दोगी का जरूर किया किंतु स्वंय खाया तेलही इतनी सुंदर नारी से विवादों किया किंतु उसके उपयोग करने का सौभाग्य तुम्हें ना मिल सका अभिव्यक्ति की ताजगी और भाव की तीव्रता के कारण बीसलदेव रासो लोक जीवन के रंग में अधिक रंगा हुआ है राजमती के वियोग वर्णन के लिए कवि ने जो बारहमासा दिया है वह अपने ढंग का अकेला है।



*) पृथ्वीराज रासो

रासो काव्य परंपरा का सर्वश्रेष्ठ एवं प्रतिनिधि ग्रंथ पृथ्वीराज रासो है। आचार्य रामचंद्र शुक्ला ने इसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य और इसके रचयिता चंद्रवरदाई को हिंदी का प्रथम कवि माना है।  चंदवरदाई दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सामंत सलाहकार मित्र और राज्य कवि थे।

 इनके विषय में प्रसिद्ध है  कि पृथ्वीराज और चंदबरदाई दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था और दोनों की मृत्यु एक ही दिन हुई थी कवि चन्द के चार पुत्र थे जिनमें से चतुर्थ पुत्र जल्हाण था।

जिस समय पृथ्वीराज को मोहम्मद गोरी बंदी बनाकर गजनी ले गया तो उस समय चन्दवरदाई भी उसके पीछे गए और अपने पुत्र जल्हाण को अपनी अधूरी रचना पृथ्वीराज रासो दिया‌। इस संबंध में यह उक्ति प्रसिद्ध है।
' पुस्तक जल्हाण हाथ दै, चली गज्जन नृप काज। ' बाद में जल्हाण ने इस अधूरी रचना को पूरा किया था।

पृथ्वीराज रासो के मध्यम, लघु, और लघुत्तम चार संस्करण प्रसिद्ध है।
इन चारों संस्करणों को देखकर पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर विद्वानों ने 3 वर्ग है। विद्वानों का एक वर्ग पृथ्वीराज रासो को पूर्णतया जाली एवं प्रामाणिक माननीय वालों का है।

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