आधुनिक काल की धार्मिक परिस्थितियां।

आधुनिक काल की धार्मिक परिस्थितियां।


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अंग्रेजों के भारत आगमन के बाद हमारे देश में धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया। विचार स्वातंत्र्य ने श्रम ( labour)के नाम पर होने वाले अनाचार, अत्याचार ,दुराचार और अनेक अनिष्ट परंपराओं पर बड़े हमले किये। लगभग धार्मिक स्थान अनाचार के अड्डे बने थे। अनेक धर्म यहां प्रचलित थे। वे विभिन्न संप्रदायों में विभाजित हो चुके थे। हिंदू धर्म ने व्यवस्था के तहत पिछड़ी जातियों का अंग्रेजों ने बहुत शोषण किया शोषण किया।



ब्राह्मणी वर्चस्ववाली ( Supremacist) व्यवस्था ने कई प्रकार के कर्मकांडो के बल पर सामान्यो को ठगा। चंडो, मंहतो का सामाजिक वर्चस्व, सद्भाव को कहीं पर भी रखता नहीं था सहयोग की अपेक्षा शत्रुतत्व कोही एक प्रकार से बढ़ावा मिलता रहा। लोक केवल श्रद्धालु नहीं बल्कि अन्य श्रद्धालु बने थे।
ऐसे में ब्राह्मण समाज ,प्रार्थना समाज ,आर्य समाज ,थियोसोफिकल सोसायटी ने पुराने हिंदू धर्म को नए सांचे में डालने का कार्य किया ।ऐसे करते समय कर्मकांड, और रूढ़ियों ,जाति प्रथा आदि पर कुठाराघात किया। 


आर्य समाज आदि में इसके संबंध में अंर्तर्विरोध स्पष्ट है। आर्य समाज में जाति प्रथा को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हिंदू धर्म का यह नया संस्करण मात्र एकेशवर वाद विधवा विवाह प्रचलन बाल विवाह विरोध सती प्रथा विरोध स्त्री शिक्षा एवं समानाधिकारका समर्थन करते हुए भारतवर्ष में नवजागरण फैलाने का कार्य करते हुए स्थापित हो रहा था यही कारण है कि नवजागरण को कुछ विद्वानों ने हिंदू धर्म का पूनरूत्थान के रूप में देखा है।


.                ( Dayananda Saraswati) Mool Shankar 
                                       Founder of Arya Samaj 

वस्तुत: आर्य समाज की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। दयानंद सरस्वती ने भले ही ईसाई धर्म प्रचार की प्रतिक्रिया के रूप में आर्य समाज की स्थापना की उन्हीं में से आगे चलकर धर्म शुद्धि आंदोलन पैदा हुआ। संप्रदायिकता की नींव रेनेसां मैं ही दिखाई देती है।

बंगाल एवं महाराष्ट्र ने रूढ़ीवादी परंपरा में जकड़े भारत को आधुनिक बनाने का काम किया जिससे नई समस्याओं भी भारत में पैदा हुई हिंदू मुस्लिम संघर्ष संप्रदायिकता , हिंदी उर्दू विवाद आदि।

फिर भी सामाजिक एकता सद्भाव तथा धार्मिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव की ओर भारत बढ़ता गया स्वामी दयानंद सरस्वती नें दो महत्वपूर्ण कार्य एक राष्ट्रीयता का संचार एवं दूसरा राष्ट्रभाषा का प्रचार विज्ञान की अति बौद्धिकता का विरोध कर भारतीय अध्यात्मवाद का उत्तान इसी युग में दिखाई देता है।



आगे चलकर गांधीजी का सामान्यवादी दृष्टिकोण जो बना यह उसकी पूर्वपिठीक ही है। कई धार्मिक रूढ़ियों बदलने लगे जैसे समुद्र को ना लाघंना, दहेज प्रथा का विरोध पूंजीवादी या जमीदारी प्रथा का विरोध घोर अंधविश्वासों का विरोध होने लगा ।स्त्री शिक्षा का प्रभाव समर्थन एवं दलितों के प्रति सहानुभूति की भावना ने नए मानवीय दृष्टिकोण को विकसित किया।

भारत को प्राचीन एवं मध्यकालीन संकीर्णता से बाहर निकालकर उसे आधुनिकता की ओर बढ़ाया धर्म के प्रति नया नैतिक विश्वास बड़ा या धर्म के भीतर गतिशीलता का संचार कर उसे पूर: संक्रिया किया।
पश्चिमी रीति नीति का स्वीकार करते समय मात्र इन में अंतर्विरोध दिखाई देता है।
डॉ नागेंद्र ने कहा है कि उनके आदर्शों और व्यवहारों में समर्थ एकरूपता नहीं मिलती।






*)उदाहरणार्थ: रविंद्र नाथ ठाकुर परिवार ब्राह्म था।
ब्राह्म समाज में मूर्ति पूजा के लिए कोई स्थान नहीं है पर रवींद्रनाथ टैगोर का परिवार खूब धूमधाम के साथ दुर्गात्सव मनाया था। आर्य समाज में वर्ण व्यवस्था जन्मना नहीं कर्मणा मानी जाती है पर आर्य समाजों में बहुत कम लोग मिलेंगे जो जाति के बाहर विवाह संबंध स्थापित करने में संकोच का अनुभव न करते रहे हो दूसरा अंतर्विरोध यह ताकि राजा राम मोहन रॉय रानडे आदि बहुत से लोग ब्रिटिश राज्य को देश के लिए वरदान समझते थे लेकिन प्रजा के दोहन शोषण आदि का विरोध करते थे समाज में एक और संस्कृतिकरण बढ़ रहा था तो दूसरी ओर लोकी किरण
सभी सुधारकों को एक और विदेशियों के सामने अपने धर्म और संस्कृति की वकालत करनी पड़ती थी तो दूसरी ओर देशवासियों के सामने धर्म का नया और अर्थापण करना पड़ता था।

जो भी हो भारतीय धर्म में हिंदू धर्म एक प्रकार की संक्रति काल से गुजर रहा था धर्म का नया दृष्टिकोण आविष्कृत हो रहा था।

यह सब कुछ ब्रिटिश ओं के कारण संभव हुआ इसे स्वीकारने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए भारत के आधुनिकीकरण कि यह प्रारंभिक स्थितियां थी जिसमें धर्म को नए सांचे में डालना जरूरी था परिवर्तन की प्रक्रिया का य आगाज ईसाइयों की देन रही है गणतंत्र के अभिभावक के साथ ही।   


 असांप्रदायिक जनवादी शासन की नींव पड़ी समता स्वतंत्रता भाईचारा के साथ सामाजिक न्याय हक ने धर्म के स्वरूप को ही बदल दिया वह तर्क के बल पर सड़ी गली रूढ़ियों के वर्चस्व के विरुद्ध आवाज देने लगा है।

*फिर भी धर्म के नाम पर मनुष्य भावनाओं को बोलने का कार्य सांस्कृतिक राष्ट्रीय वादियों की ओर से बदस्तूर जारी है यही कारण है कि प्रगतिशील कहे जाने वाले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के हाथ गणेशजी दूग्धपान कर रहे हैं।
 राजस्थान विधान भवन परिसर में मानव मूर्ति की प्रतिष्ठा पाना हो चुकी है धर्म संसद की घोषणा ने मानवता को पकड़ कर रखा है अब संविधान नहीं संहिताए होगी का नाद गूंज रहा है। सन 1990 के बाद का साहित्य इसी का प्रतिफलन है।






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