हिंदी साहित्य-हिंदी कहानी का विकास ( प्रेमचंद पूर्व कहानी)

 प्रेमचन्द पूर्व कहानी -

हिन्दी में सर्वप्रथम कहानी लाने का श्रेय 'सरस्ती' मासिक पत्रिका को ही है। इसमें सबसे पहले किशोरीलाल गोस्यामी की 'इन्दुमती नामक कहानी प्रकाशित हुई। निरिजाकुमार घोष ने 'पार्वतीनन्दन' उनाम से बंगला की अनेक कहानियों का हिन्दी में भावानुवाद किया।

'बंग महिला' नामक एक महिला ने कूछ मौलिक कहानिरयोँ लिखी, जिसमें 'टुलाईवाली' कहानी प्रसिद्ध है। इसी समय से श्री भगवानदास ने 'म्लेग की चुडैल', रामचन्द्र शुक्लजी ने न्यारह वर्ष का समय' तथा गिरिजादत वाजपेयी ने पांडित और पंडितानी' नामक कहानियों लिखी। 


 इनमें  से मार्मिकता की दृष्टि से 'इन्दुमती", 'न्यारह वर्ष का समय' तथा 'दुलाईवाली' ही हिन्दी की मोलिक साहित्यिक कहानियाँ मानी जा सकती हैं आ. शुक्लाजी 'इन्दुमती' को हिन्दी की पहली सर्वश्रेष्ठ कहानी मानते हैं। इन्ही सभी कहानियों से हिन्दी कहानी साहित्य का आरम्भ हुआ है।


 इसके उपरान्त जयशंकर प्रसाद ने 'इन्दु' नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया, जिसने हिन्दी कहानी के स्चस्थ विकास में महत्त्वपूर्ण योग दिया। इसी पत्रिका में प्रसाद की प्रथम कहानी 'ग्राम' सन् १८११ मे प्रकाशित हुई। हास्यरस की कहानियाँ लिखने वाले जी. पी. श्रीवास्तव की पहली कहानी 'इन्दु' मे सन् १८११ में प्रकाशित हुई। इसी समय प. विश्वम्बर नाয शर्मा ने भी कहानी लिना प्रा५ किया उनकी पहली कहानी 'रक्षा बनधन' सन् १८१३
में सरस्वती में छवी। 


इसी प्रकार राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की पहली कहानी 'कानों में कंगना सन् १८१३ में 'इन्दु' में प्रकाशित हुई। अस्तु।
इन्दु' का योगदान - हन कह सकते हैं कि आधुनिक कहानी के स्वास्थ रूप की परम्परा হन्दु' के प्रकाशन के साध सन् १८११ से आशम्भ होती है। इन्दु' ने एक ओर नवीन कहानीकारों को प्रोत्साहन प्रदान किया और, दूसरी ओर उसके कारण कहानी की कला में सुधार हुआ, साथ ही कहानी के उद्देश्य सामने आये।


हिन्दी कहानी का भाग्य प्रसाद के इस क्षेत्र में पदा्ण करते ही चमक उठा। सन् १९११ में उन्होंने 'इन्दु' नामक पत्रिका में अपनी 'ब्राम' कहानी छपवाई। इसके उपरान्त उनकी अनेकानेक उध-कोटि की कहानियोँ प्रकाशित हुई जिनमें आकाशद्रीप, छाया, प्रतिध्यनि आँधी, बिसाती, इन्द्रजाल, स्वर्ग के खण्डहर आदि कहानियां हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि २१० मानी गई। 


प्रसादजी की कहानियों ने कौलुहल की प्रथानता है। इनकी ओजपूर्ण संस्कृत-निष्ठ शैली कथा के अनुरूप उवित बातायरण उत्पन्न कर उत्तके प्रभाव को अत्याधिक धनीभूत बना देती है। अन्तार्दंद्र ऑर भावनुकूल प्रकृति पित्रण इनकी विशेषता है। चरित्र-चित्रण,कोपकन आदि के कलामक रूप ने इनकी कहानियों में अपूर्व नाटकीयता, रमणीयता का समावेश कर दिया है। इन कहानियों का आरम्भ अदभुत नाटकीयता के साथ होता है। 


परंतु प्रसाद कहानी को जनवादी रूप प्रदान करने में असमर्थ रहे थे। अपनी संस्कृत-निष्ठ प्रांजल शैली और विशिष्ठ कथ्य के कारण उनकी कहानियाँ विशिष्ठ पाटक-वर्ग तक ही सीमित होकर रह गई। 

हास्त्यरस-सफ्राट जी, पी. श्रीवास्तव ने भी इसी समय हास्यरस प्रधान कहानियाँ लिखना आरम्भ किया और अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त की। राजा राधिकारमण प्रसादसिंह की कानों में कॅगना' नामक कहानी भी अत्यन्त लोकप्रिथ हुई। विश्व-भरनाथ शर्मा 'कौशिक' की पहली कहानी 'रक्षाबन्धन' सन् १९११ में 'सरस्वती में प्रकाशित हुई। कौशिक की कहानियों में पारिवारिक जीयन का वित्रण विशेष रूप में हुआ है। इनका पारिवारिक जीवन का अध्ययन, निरीक्षण, मनन गम्भीर और सूक्ष्म धा। उनकी 'ताई' नामक कहानी- इस दृष्टि से उल्लेखनीय है।


इस युग के कहानी लेखकों में ज्वालादत शर्मा और यतुस्सेन शास्त्री के नाम भी उल्लेखनीय है।
सन् १९१५ में चन्द्रश्र शर्मा गुलेरी की प्रथम कहानी उसने कहा था' प्रकाशित हुई। यह कहानी पवित्र प्रेम के लिए किये गए निःस्वार्थ अलिदान की कहानी है शुक्लजी के शब्दों में "इसमे यथार्थवाद के बीच सुरूचि की चरम म्यादा के भीतर भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यन्त निपुणता के साथ संपुटित है।..... इनकी घटनाएँ बोल रही है, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।" इस कहानी ने गुलेरीजी को अमर बना दिया है।

 हिन्दी की यही सबसे पहली सर्यांगपूर्ण यथार्थवादी कहानी है जो कला के प्रत्येक अंग पर खरी उतरती है। वस्तुतः 'उसने कहा था' से ही हिन्दी-कहानी का वास्तविक विकास मानना चाहिए।







Previous
Next Post »
loading...