पृथ्वीराज रासो



*पृथ्वीराज रासो:-

* रचनाकार - चन्दबरदाई
रचनाकाल
1225 से 1249 वि.सं.
काव्य स्वरूप - महाकाव्य
नोट : नरोत्तम स्वामी के अनुसार यह मुक्तक रचना है।
* आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार यह हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य तथा चन्द
बरदाई हिन्दी के प्रथम महाकवि हैं।
* कुल पद
* प्रमुख अलंकार - अनुप्रास व यमक
* इस महाकाव्य में कुल 68 प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया गया है, जिनमें छप्पय छन्द
का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है। अतः शिवसिंह सेंग्र ने चन्दबरदाई को 'छप्पयों का
राजा' कहा है।
68 प्रकार के छन्दों का प्रयोग होने के कारण इस रचना को 'छन्दों का अजायबघर'
कहते हैं।
नोट : यदि परीक्षा में प्रश्न आये तो उत्तर रामचन्द्रिका होगा, क्योंकि इसमें 100 प्रकार
के छन्दों का प्रयोग है।
16306
* भाषा - राजस्थानी व ब्रज भाषा का मिश्रण
* इस रचना में ब्रज भाषा का अधिक प्रयोग हुआ है, अतः इसमें पिंगल शैली का प्रयोग
माना जाता है।
नायक - अजमेर के चौहान राजा अर्णोराज चौहान के पौत्र एवं सोमेश्वर चौहान के पुत्र
पृथ्वीराज चौहान
नायिका - कन्नौज के राजा जयचन्द की पुत्री संयोगिता
पृथ्वीराज रासो के चार रूपान्तरण प्राप्त होते हैं-
वृहद रूपान्तरण :-
इसमें 69 समय / सर्ग तथा 16306 छन्द हैं।
इस संस्करण का प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा 1 585 ई. में हुआ था ।
इसकी हस्तलिखित प्रति उदयपुर संग्रहालय में है।
2. मध्यम रूपान्तरण :-
इसमें 7000 छन्द हैं।
इसका प्रकाशन अगरचन्द नाहटा ने करवायी


হसकी हसतलिखित प्रति अथहन एवं बीकानेर संगरहालय में सुरक्षित है।
3. लधु पान्तरण
इसमें 3500 छन्द है तथा इसका प्रक्ञाशन ने चन्द्रसिंह ने करवाया।
হसकी नतलिखित प्रति बीकानेर संलय में सुरवि है।
4. लम पजयान्तरण =
হसमें । 30। छन्द हैं तथा इसका प्रकाशन अगरथन्द नाहटा ने कपवाया।
डॉ. दशनथ शर्मा ने इसी संस्कनण को मूल रासो काव्य माना है।
अप्रामाणिक - पं. गौपीशंकर हीराचन्य ओझा मुन्री देवीसाद, आचार्य रामचन्द्र शुकल,
डॉ. दूलर व डो. रामुमार वर्मा इस य को आप्रागाएि
इस ग्रन्ध को अपरामाणिक मानने वाले सर्वप्रधम विद्वान ह.
TB75 ई, में इसे आ्नागिक घषित किया
आचार्य शुक्ल इस पूरे ग्रन्ध को जाली
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नते हैं।
वूलर माने जाते हैं, जि्होने
अंप्रामाणेक - आ तजारीप्रसाद हवेदी, चुनीति कुमार चटी च अगरदन्द नाहटा
ছसे अ्धग्रामाणेक मानते ।
प्रामाणिक याबू श्यामसुन्दर दास, मिश्रबन्धु, करनल जेम्स टॉड, डो. दशरघ रार्मा, डॉ.
नगेन्द्र व सर जा्ज तिय्न इसे प्रामणिक मानरोे हैं
* চरा ग्र की सयम जानकारी कल जम्स टॉड ने अपनी पुरतक एनाल्स एण
िक्वटीज ऑफ राजस्थान' े वी थी। उन्होंने हसाके एक भाग को संगोपता नेग' के
नाम से प्रकशित कराया थ ।
* आचार हजारीप्रसाद हमेी में छस चना को शुक-शुवरी संवाद कहा है।
* टॉ. नगेन्द्र ने इस रचना को घटनाशोश कहा है।
* बाबू गुलायराव ने इस रथना को स्वाभाविक विक्ासशीत महाकाय कहा है।
* वायू शयामसुन्दर चास व छदयनाराण तिवारी ने इसे विशाल वीर काव्य कहा है।
* पृथ्वीराज चौहान की सभा के एक कश्नीरी कवि जयानक ने संस्कृत में पृथ्वीराज
विजय' नामक ग्रन्छा भी लिखा है।
* पृथ्वीराज राक्ती में आपू के युण्ड से चार क्रिय कुलों की उत्प्ति वताई जाी है।
* आचार्द राचन्द्र शुक्त के अनुसार हन्वरवाई का जन्म 116B ई. मैं लाहीर में भट्ट
जाति के जग। नामक गौ में हुआ था।
* चन्ववरवाई व पृथ्वीराज चौहान का जन्म व निधन एक ही दिन माना जता है।
* ये पृथ्वीराज चौहान के तीन प्रधान मन्त्रियो में से एक थे-
हैमास, रसिंह पुरोहित व चन्दयरवई
* में पड़भाश व्याकरण के जाता की।
तत्कालीन अड्माण - संस्कृत, प्राकृत, अश्हट्ठ पैशाची शोरसेनी व मागधै
* ছলका वचपन का नाम 'नुथी भट्ट बल्ा
* इनके दो विवाह हुए। इनी पहली पनी का नाम कলা तथा दूसरी पल्नी का नाम
गौरी था। गौरी क जमनाम राजीरा ।
* हन्दवरदाई ने पृथ्वीराज राती
सुनाई थे।
का सर्वन राजीरा को ही पनीतर शैली में
सन्तान की, जिनमें दस पुत्र व एक पुत्री ये।
* इनके बध्ये पुत्र का नाम जल्हेण था, जिसने इस अधूरे काव्य को पूरा किया था।

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