हिंदी कविता धरे रहो धीरज


धरे रहो धीरज,
साहस मत छोड़ो,
होगी जय निश्चय ही।
फट जायेगा सघन अंधेरा,

कहीं कुछ भी न होगा भय ही,
होगी जय निश्चय ही।
देखों, उधर पूरब में,
आकाश के थाल पर,

गहन अंधकार को चीर,
सूरज झलक रहा,
हो रहा उसका उदय ही,
होगी जय निश्चय ही।


यह सारे हैं केवल रात के दैत्य,
सब भीतर से हैं खोखले,
इनसे न डर,
आयेगा सवेरा जरूर,

इसमें संशय नहीं,
होगी जय निश्चय ही।
दौड़, निकल आ घर से,
देख, बाहर हो रहा प्रकाश,
निकलेगा सूरज निश्चय ही,

होगी जय निश्चय ही।
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