एक शराबी की आत्मकथा

शराबी की आत्मकथा

हाँ, में शराबी हूँ। मैंने अपनी इस करतूत से परिवार तथा अपनी इज्जत धूल में मिला दी है।
कभी में शराब को पिता था, आज वह मुझे पी रही है। मुझ जैसे एक अच्छे परिवार का, पढ़ा-लिखा पर आज अपनी कर्मकहानी आपको बताता हूँ। शरीर से जरूर मैं कमजोर हो गया हूँ, लेकिन अभी तक मेरा दिमाग ठिकाने पर है।

एक सधन, ऊँचे कुल में जन्मे बच्चे का बचपन वैसे तो वैभव में ही बीतता है। लेकिन मेरे कदम उस वक्त बहक गये थे, जिस वक्त मेरे पिताजी ऊँचे सरकारी ओहदे पर और माँ कॉर्पोरेशन की सदस्या होने से धर में लगातार दावतें होती थीं ऊँचे-ऊँचे किस्म की शराब हर पार्टी में पानी की तरह बहा
करती थी। समाज के ठेकेदारों के कहकहे लगते और उसी वक्त सबकी आँख चुराकर मैं भी एक-दो गिलास गले के नीचे उतार देता। एक बार पकड़ा जो गया, लेकिन मुझे मना करने के बजाय मेरे माता-पिता ने मुझे दावत में शामील होने के लिए कहा। बस, यही थी शुरुआत! उस जवानी के दिनों में काफी पैसे जेब में होते थे और दावतों की कमी नहीं थी। मेरा बड़ा भाई इन सब बातों से नफरत करता था। मुझे भी उपदेश करता था, लेकिन मेरी आँखों पर परदा था और कान बहरे हो गये थे।

लेकिन अलग रहता हूँ। माता-पिता एक कार दुर्घटना के शिकार हो गये उनकी वसीयत के मेरा बड़ा भाई शहर का नामी डॉक्टर है। उसका अपना छोटा सुंदर परिवार है। मैं उसी के साथ अनुसार बॅटवारा हुआ था। मैंने सारा धन नशे में फूँक दिया। न कभी कोई नौकरी की, ना एक पैसा मेहनत से कमाया। शराबी दोस्तों की कमी नहीं थी। यात्राओं पर दूर दूर जाना, क्लबों में जाना,ऊँची-ऊँची शराब पीना, जुआ खेलना इन सबके आगे लक्ष्मी रूठकर कब चली गई पता ही नहीं चला। जब शरीर जवाब दे चुका था, इलाज के लिए पैसा बाकी न रहा तो पछतावा हुआ, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। मैंने भाई और भाभी के पाँव पकड़े। उन्होने रहमकर इलाज करवाया, हालत सुधरी। करीब तीन महिने मैं शराब को नहीं छुआ। लेकिन हर किसी का नफरत का बर्ताव देखकर जिंदगी अब शराब के गिलास में खतम करने फिर पीना शुरू किया।

आज मेरी जिंदगी कितनी बाकी है यह मैं कह नहीं सकता। भाई इलाज कराना चाहता है, मैं ही इन्कार कर देता हूँ। मेरे गुनाहों की सजा में भुगत चुका हूँ। बस! यही है मेरी जिंदगी की दास्तान।














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