एक भिखारी की आत्मकथा

भिखारी की आत्मकथा

मैं इस शहर में जो सैंकड़ों भिखारी हैं, उनमें से एक हूँ। दांता से दया की याचना क उनकी नफरत की बातें सहना, भीख न मिली तो आसुओं के घुंट पीकर रहना और भूख मिटानी के तो जहाँ कूड़ा-कचरा फेंका जाता है वहाँ जाकर जूठी पत्तले चाटना, यही हमारी जिंदगी है। खहकी छत के नीचे जहाँ कहीं जगह मिले वहीं सोना और नसीब को कोसते एक दिन मर जाना यही हमारा जीवन है।


मेरा जन्म कहाँ हुआ, मेरे माता-पिता कौन हैं, इसका मुझे कुछ पता नहीं! एक भीखमँगे की गोद में पला और उसी गोद से भीख माँगना सीखा। बड़ा हुआ तो आप लोगो के कटुवचन सुनकर गुनहगारी के जगत में आया।

 वहाँ भी नसीब ने साथ नहीं दिया। दस साल की उम्र में मूझे जेल की
सलाखों के पीछे रहना पड़ा। छः साल 'बाल सुधार भवन' रहा। वहाँ से बाहर आया तो किसी ने भी नौकरी नहीं दी। फिर वही चोरी' का रास्ता पकड़ लिया। एक बार लोगों से पिटाई होने से बचने तेज भागा और रास्ता पार करते समय एक मोटर से टकराया। फिर अस्पताल और जेल! मेरा एक हाथ
काटना पड़ा था और ठीक से चलना मुश्किल हो रहा था। जिंदगी भर पाँव घसीटते चलना नसीब में लिखा था।

आज इस तरह भीख माँगते कितने साल गुजरे इसका हिसाब मेरे पास नहीं है। लोग दुत्कारते है,पुलिस शक करके पिटाई करती है। हमारी जेब से पैसे निकालते हैं। कभी मंदिर के पास बैठता हूँ।

तो चार पैसे जरूर मिलते हैं, लेकिन वहाँ तो 'इधर भीख मॉँगना मना है' के फलक होते हैं। वहा से हमें भगा दिया जाता है। बारिश के दिन हमारे लिए मौत के समान है, इसलिए कोई छोटा-बड़ा गुनाह करके चार महिने जेल में बिताता हूँ। कम से कम वहाँ नियमित खाना मिलता है और सोने के लिए जगह। और कभी बीमार हुआ तो दवा-पानी हो जाता है।

अब जिंदगी के जो बचे-खुचे दिन बाकी हैं वे इसी तरह बीत जाएँगे दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग हमेशा मरते हैं, उनकी गिनती कीन रखता है, उसी तरह में भी कहीं किसी एकाध पगडंडी पर मरा हुआ आप पायेंगे।
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